निर्माण मज़दूरों के साथ आम सभा


10-07-2018 को किर्ती नगर चुना भटटी मे निर्माण मज़दूरों के साथ आम सभा का आयोजन किया गया। इस सभा मे 300 महिला व पुरूषों ने भाग लिया।
सभा मे दिल्ली निर्माण मज़दूर संगठन के कार्यकत्ताओं ने मज़दूरों को बताया केन्द्रीय सरकार द्वारा 44 श्रम कानूनों को किस तरह 4 कोड मे बदला जा रहा है और दिल्ली के श्रम विभाग मे पिछले दो महीनों से कोई काम नही हो रहा है, और बढते हुये भष्ट्राचार की जानकारी दी।
लेबर ओफिस मे किस तरह भष्ट्राचार रूपी दिमक हमारे कानून को समाप्त कर रहा है। यह विषय हमारे सामने भयंकर रूप धरण किये हुये खडी है। इससे निपटने की हमारी रणनीति क्या होगी।
मज़दूरों के सुझाव
पोस्टर व पर्चे के माध्यम से अपने क्षेत्र मे सभी मज़दूरों को इस विषय की जानकारी देना ।
जागरूकता के लिये, क्षेत्रीय पदयात्रा करना।
सभी लेबर ओफिसों मे धरना करेगें।
इस लड़ाई मे हम तन मन धन से संगठन के साथ मिलकर लडेगें व हमारे बच्चे भी लडेगे।
एक विशाल धरना उपराज्यपाल व श्रम मंत्री कार्यलय पर करेगें।
सभी मज़दूरों ने कहा हम इतनी आसानी से हम अपना कानून खत्म नही होने देगें आखिरी साॅस तक लडेगे।

‘हम अपना अधिकार माॅगते नही किसी से भीख माॅगते‘

घरेलू कामगारों के साथ नुक्कड बेठक


दिल्ली घरेलू कामगार संगठन के द्वारा घरेलू कामगारों के साथ नुक्कड बेठकों का आयोजन किया गया.साथ ही हस्ताक्षर अभियान का आयोजन किया गया.ताकी सरकार समाजिक सुरक्षा का कानून बनायें

लिंग भेद, योन-शोषण और घरेलु -हिंसा के मुद्दे पर पदयात्रा


दिनांक 19-05-2018 को शिव विहार में किशोरियों के साथ लिंग भेद ,योन-शोषण और घरेलु -हिंसा के मुद्दे पर पदयात्रा  आयोजन किया गया

 

सखी सहेली क्लब कि सभी लडकियों ने मिलकर लिंगभेद,घरेलु-हिंसा,भेदभाव के बारे में बैठकर चर्चा कि और अपने घर परिवार में होने वाले लिंग-भेद के बारे में आप बीती सुनाई कि किस प्रकार उनके परिवारों में उनको लड़की होने के कारण हर छोटी बात पर ताने कसे जाते है!
!! तनीषा हम सब लड़कियां इकठा हो कर जब मीटिंग में आते है तो सब लोग सोचते है के पता नहीं कहाँ जाती है ये सब ?
!! सोनिया घर में मैं कुछ बात बोलूं तो पापा बोलने नही देते और मम्मी भी फालतू में मुझे ही सुना देगी पता नही क्या है ! और मेरी दादी तो बात बात पर
मुझे बिना गलती के सुनती है? ऐसे ही समस्याएं सभी लड़कियों ने बताई !जो उनको बच्चपन से झेलनी पड़ रही है !
किशोरियों और युवा उम्र कि सभी लड़कियों के साथ सखी सहिली क्लब के माध्यम से इन लड़कियों को लिंग भेद ,योन-शोषण और घरेलु -हिंसा के मुद्दे पर कार्यशालाओं का आयोजन किया गया ! और लड़कियों का समझ निर्माण किया गया

माया के संघर्ष की कहानी माया की जुबानी


माया के संघर्ष की कहानी माया की जुबानी

माया का जन्म गाॅव-अतराहा, जिला-छत्तरपुर, म0प्र0 मे हुआ। माया को अपनी जन्म तिथि पता नही है। उसकी माॅ कहती है जिस साल बहुत सुखा पड़ा था उस साल मे पैदा हुई थी। माया तीन बहन दो भाई है, माया कभी स्कूल नही गई। माॅ बाप निर्माण मज़दूर का काम करते थे, रहने की जगह स्थाई नही थी। कभी कहाॅ कभी कहाॅ मैं पढ नही पाई, भाईयों को तो पढा दिया पर लड़कियों का पढ़ना जरूरी नही समझा। माया की शादी 13 साल की उम्र मे हुई, माया को शादी का वास्तविकता पता नही थी, पडोस मे शादी देखी, शादी मे गहने, कपडे, लडकी को मिलना अच्छा लगा, उसी को माया शादी समझ रही थी।

माया की शादी मे गहने, कपडे तो मिले पर दो दिन बाद ही ससुराल वालो ने वापस ले लिये माया बहुत रोई दो साल बाद माया का गोना हुआ। माया गाॅव से दिल्ली मे मीरा बाग की झुगियों मे आ गई। ससुराल का घर देख कर माया रोने लगी 10-12 गज की कच्ची झुग्गी छप्पर पडी हुई, उसी मे सास, ससुर, देवर, पति और माया रहते थें। एक साल तक ससुराल वालो ने उसे मायके नही भेजा जब पिता लेने आये, छोटी बहन की मृत्यु पर तब भी मना कर दिया कहा हम अपने आप ले आयेगें।

शादी के समय कहा कि लडका ड्राइवर का काम करता है 18000 कमाता है परन्तु सच्चाई थी की नौकरी स्थाई नही थी और 1500 रू महीना कमाता था। घर की स्थिति बहुत ही तंग थी। रोज घर मे कलेश सास ने घर का माहोल बहुत खराब कर रखा था। मेरा पहला बच्चा हुआ सास ताने देने लगी घर पर सारा दिन बैठी रहती है सोती रहती है काम पर जा छह महीने के बच्चे को छोड कर दिहाडी का काम किया काम करने पर भी घर का कलेश खत्म नही हुआ 50 रूपये दिहडी मिलती थी, परन्तु रोज काम नही मिलता था। छह साल मे तीन बच्चे हो गये दो लडकीयाॅ एक लडका। सास ने घर से निकाल दिया छोटे-छोटे बच्चो को लेकर भटकती रही, पति के मालिक ने अपने पुराने घर मे रखा। दिन मे ड्राईवर का काम करो रात मे चैकीदारी कुछ साल वहाॅ रहे मालिक से कर्जा लेकर छोटा सा प्लाट लिया। मालिक ने कर्जा तो दिया परन्तु मालिक ने पति की तनख्वाह बन्द कर दी, घर के खर्चे की जिम्मेदारी माया के कंधो पर आ गई कभी दिहडी, कभी कोठी मे जो काम मिलता रात दिन एक करके माया ने घर चलाया, हार नही मानी काम तो ठीक है परन्तु घर मे हिंसा खत्म नही हुई बस रूप बदल गया पहले सास मारती थी ताने देती थी, अब यह काम पति करने लगा। बात बात पर लड़ना गली देना मारना गली मोहल्लो के लोगो को इकटटा करना बेज्जत करना घर से निकालने की धमकी देना। माता पिता गरीब थे मायके का सहारा भी नही था। माया बस काम काम और काम मे ही आपना जीवन बिताने लगी सुबह 8 बजे घर का सारा काम करके निकलती रात 8 बजे 9 बजे जक मशीन की तरह काम करती थी। माया मे एक आदत शुरू से थी जब भी उस पर हिंसा होती चुप नही बैठती थी जितनी ताकत थी लडती जरूर थी। सयम बीतता गया बच्चे बडे हो गये परन्तु माया की परेशनीया काम नही हुई, पति का अत्याचार अभी भी जारी था।

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मनहोरी की उम्र 47 साल जिला-सवाई माधोपुर, राजस्थान, की साधारण रूप से दिखने वाली महिला के संघर्ष की कहानी।


मेरी कहानी


मनहोरी की उम्र 47 साल जिला-सवाई माधोपुर, राजस्थान, की साधारण रूप से दिखने वाली महिला के संघर्ष की कहानी।

बचपन का तो पता नही चला परिवार बड़ा था जिम्मेदारी ज्यादा थी घर का काम खेतो की रखवाली, गाय भैस को चराना, गेहुॅ काटई करना, भाई, बहनों की जिम्मेदारी। स्कूल की शक्ल तक देखे को नही मिली केवल बचपन मे नाम सुना था इच्छा थी परन्तु परिवारिक व सामाजिक व्यवस्था के करण स्कूल नही जा पाई।

शादी भी माता पिता ने 12 वर्ष की आयु मे कर दी, शादी का क्या मतलब है जानती ही नही थी नये कपड़े गहने मिलना अच्छा लगा। ससुराल आई तो यहॉ भी बडे परिवार की सारी जिम्मेदारी मनहोरी के कन्धो पर आ गई। शादी से जुडे सपने चूर चूर हो गये एक हाथ के घुॅघट मे घर का सारा काम करना। सुबह उठने का तो वक्त तय था 4 बजे परन्तु शाम को सोने का वक्त तय नही था सारा दिन काम और परेशानी गरीबी के करण इतने बडे परिवार को चलना मनहोरी के पति के बस से बाहर था आये दिन झगडे कलेश। काम की तलाश मे सन 1990 मे दिल्ली शहर आ गये।

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Meena, the ‘raj mistry’, sets new standards


Ambika Pandit| TNN | Updated: Mar 9, 2018, 18:42 IST

HIGHLIGHTS

  • Meena Ahirwar is setting new standards as she goes about building homes and supervising work at construction sites in her role as a head mason.
  • The “raj mistry” holds a place of prominence in the hierarchy of labourers where men continue to dominate the work profile.

NEW DELHI: Defying patriarchy and breaking into a carefully guarded male bastion, Meena Ahirwar is setting new standards as she goes about building homes and supervising work at construction sites in her role as a “raj mistry“, or head mason.

Meena Ahirwar and her husband respond calmly to the ‘shock and awe’ her ‘raj mistry’ status often evokes. (TOI photo)

Right now, she is part of the construction team building a three-storey house in Hari Nagar. From layering neatly laid out rows of bricks with cement and checking the column strength for durability to keeping a watch over the junior mason and the helpers, Meena’s confidence on site shows she is no less than the men on the job.

Masonry is classified as skilled labour and commands a higher daily wage. The “raj mistry” holds a place of prominence in the hierarchy of labourers where men continue to dominate the work profile.

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दिल्ली निर्माण मज़दूर संगठन द्वारा, द्वारका में रैली एवं पद यात्रा


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