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निर्माण मज़दूरों के कानून का एक दुखद अध्याय

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Sub: Notice of peaceful dharna (sit-in) at your office for the below mentioned issues:

  1. Denying the registration, renewal and processing of claim applications of construction workers under Delhi Building & Other Construction Workers Welfare Board (DBOCWWB) by Labor department officers since May’2018.
  2. Non settlement of pending cases since long- Non issuing of pass books to verified construction workers, illegal detention of pass books for renewal, lapse cases and claim applications under various social security schemes of DBOCWWB.

साथियों, हमारे देश की अर्थव्यवस्था मज़दूरों की लूट और शोषण पर खड़ी है। चाहे राजतन्त्र हो या लोकतन्त्र, मज़दूरों की स्थिति मे कोई सुधार नही हुआ। आज देश मे मज़दूरों और किसानों की स्थिति को देखते हुये निराशा होने लगती है। दोनांे अपनी जगह मजबूर दिखते हैं। गांव मे भी उत्पादन का मोल नहीं और शहरों मे भी असहाय श्रम। देश के छोटे बड़े सभी शहरों में सुबह सुबह नाके/लेबर चैक पर सस्ते श्रम का बाजार सजता है। यहाॅं प्रतिदिन हजारों मज़दूर काम की तलाश में आते हैं जिनमें से कुछ हीं लोगों को काम मिल पाता है। जिन श्रमिकों को काम मिलता भी है तो उन्हें पर्याप्त मज़दूरी नहीे मिलती है, काम की सुरक्षा नहीं होती और ज्यादातर मज़दूरों की मज़दूरी भी मार ली जाती है।  ये सभी निर्माण श्रमिक हैं जो देश का निर्माण और विकास करते हैं और देश की अर्थव्यवस्था मे महज्वपूर्ण योगदान भी करते हैं।

जिस देश मे 93ः श्रमिक रोज जिन्दा रहने के लिये सघर्ष करते हों, वह देश खुशहाल कैसे हो सकता है। इन 93ः असंगठित श्रमिकों में 10 करोड़ के लगभग निर्माण श्रमिक हैं। सालांे के लम्बे संघर्ष के बाद निर्माण मज़दूरों के लिये 1996 मे एक कानून बनाया गया। केन्द्रीय कानून बनने के बाद भी राज्य सरकारंे वर्शों तक सोई रहीं। राज्यों मंे सेस के माध्यम से पैसा इकट्टा होता रहा लेकिन मज़दूरों के कल्याण के लिये कोई कदम नही उठाया गया। कानून का पालन करवाने के लिये जन संगठनों के राश्ट्रीय अभियान समिति को सुप्रीम कोर्ट का सहारा लेना पड़ा। सुप्रीम कोर्ट के 2010 के आदेश के बाद सभी राज्यों ने अपने यहाॅ निर्माण मज़दूर कल्याण बोर्ड का गठन तो किया लेकिन नौकरशाहों के उदासीन रवैये, भ्रश्टाचार और राजनैतिक दलांे की इच्छा शक्ति न होने के कारण मज़दूरों को सामाजिक सुरक्षा का लाभ नही मिला। कुछ राज्यों मे तो राजनैतिक दलों ने अपने राजनैतिक लाभ के लिये भी इस कानून का इस्तेमाल किया। अभी ठीक से इस कानून का पालन शुरू भी नही हुआ था तभी केन्द्र सरकार ने नया सामाजिक सुरक्षा कोड का ड्राफ्ट लाकर ऐसे सभी कानून को खत्म करने का मन बना लिया जिनसे मज़दूरों को सामाजिक सुरक्षा का लाभ मिलता रहा है। नये सामाजिक सुरक्षा कोड के आने से पंद्रह सामाजिक सुरक्षा के कानून खत्म हो जायेंगे जिनमे निर्माण मज़दूरों का सामाजिक सुरक्षा का कानून भी है।

दूसरी तरफ सुप्रीम कोर्ट ने निर्माण मज़दूरों के लिये देश भर में एक जैसी सामाजिक सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिये श्रम मंत्रालय, भारत सरकार को इसकी जम्मेदारी दी। मंत्रालय द्वारा दस सदस्यों की एक टास्कफोर्स कमेटी का गठन किया। यह कमेटी त्रिपक्षीय होनी चाहिये थी परन्तु इस कमेटी में मज़दूर प्रतिनिधियों के तरफ से सिर्फ एक ही प्रतिनिधि को रखा गया था। इस देश के मज़दूरों का यह दुर्भागय है कि इस कमेटी मे जिन प्रतिनिधियों को रखा गया उनका निर्माण मज़दूरों के साथ काम करने का कोई अनुभव नही था। उन्होने, जो लाभ मज़दूरों को वर्तमान में मिल रहे थे उनको  बहुत कम कर दिया या खत्म कर दिया।

दिल्ली मे यदि इस कानून के पालन की बात करे तो यहाॅ भी स्थिति बहुत खराब है। श्रम विभाग के भ्रष्ट अधिकारियों ने  बड़ी संख्या मे निर्माण क्षेत्र की ट्रेड यूनियनों का पंजीकरण किया। इन यूनियनों ने भ्रष्ट अधिकारियों के साथ मिलकर मनमाना पैसा वसूलते हुये सभी नियमों को ताक पर रखकर बड़ी संख्या मे गैर निर्माण मज़दूरों का पंजीकरण करवाना शुरू कर दिया। मजदूरों को विभिन्न प्रकार के प्रलोभन दिये गये। एक ही परिवार के 18 वर्श के उपर के सभी सदस्यों का निर्माण मज़दूर कल्याण र्बोड मे पंजीकरण कराया गया चाहे वो व्यक्ति किसी भी तरह का काम करता हो। नियम के अनुसार, सभी निर्माण मज़दूरों को पंजीकरण एवं नवीनीकरण के समय व्यक्तिगत सत्यापन के लिये जिला कार्यालय जाना अनिवार्य है। घर बैठे काम कराने का लालच देकर मज़दूरों से मनमाना पैसा वसूला गया और उन्हें जिला श्रम कार्यालय नहीं जाने दिया गया।  जिला श्रम कार्यालयों से पंजीकरण एवं नवीनीकरण के समय मज़दूरों की उपस्थिति के रिकार्ड या तो गायब कर दिये गये या फर्जी रिकार्ड तैयार किये गये। निर्माण मज़दूरों को मिलने वाले सभी सामाजिक सुरक्षा लाभ पर भी एक निश्चित रिश्वत की राशि मज़दूरों से वसुली जा रही है।

आज इसका परिणाम यह है कि जो मज़दूर या मज़दूर संगठन रिश्वत नहीं देते हैं, उनका ना तो समय पर पंजीकरण एवं नवीनीकरण होता है और ना ही लाभ के आवेदन पर कोई कारवाई होती है। ज्यादातर मामलों में ऐसे मज़दूरो की फाइलें जिला श्रम कार्यालयों से गुम कर दी जाती हंै। तमाम शिकायतों के बाद भी दिल्ली के श्रम विभाग ने आज तक किसी भी श्रम अधिकारी के खिलाफ कोई कारवाई नहीं की है। दिल्ली सरकार और श्रम विभाग के उच्चाधिकारियों ने इसे रोकने का कोई प्रयास नही किया। श्रम विभाग की गैरजिम्मेदारी का फायदा अन्य लोगांे ने अपने हितलाभ के लिये उठाया जिसके फलस्वरूप पिछले तीन महीनों से निमार्ण श्रमिकों का पंजीकरण, नवीनीकरण और लाभ वितरण के सभी काम रोक दिये गये।

आज निर्माण श्रमिक पंजीकरण, नवीनीकरण और लाभ के आवेदन लेकर सभी जिलों मे भटक रहे हंै। श्रम अधिकारियों ने बिना किसी लिखित आदेश के निर्माण श्रमिकों के सारे काम बन्द कर दिये। आज निर्माण श्रमिक निजी स्वार्थ और नौकरशाहों की गैरजिम्मेदारी और उदासीनता का शिकार हो रहंे है। जो कानून मज़दूरों की सामाजिक सुरक्षा को सुनिश्चित करने के लिये बनाया गय था वह कानून आज धीरे-धीरे दम तोड़ रहा है।

साथियों, तमाम परिस्थितियों का आॅंकलन करें तो इसमे नुकसान सिर्फ निर्माण मज़दूरों का है। भ्रश्ट यूनियनों एवं अफसरों ने आपकी अज्ञानता का फायदा उठाते हुये आपके पैसे की लूट की और आपको गुमराह भी किया। निर्माण मज़दूरों के कानून से मिलने वाले अधिकारों से भी आपको वंचित किया। यदि समय पर आपका पंजीकरण और नवीनीकरण नहीे होता है तो आप किसी भी लाभ के हकदार नहीं होंगे। यदि यह कानून खत्म होता है तो नुकसान केवल निर्माण मज़दूरों का ही होगा।

साथियों आज वक्त है संगठित होकर इस भ्रश्टाचार और अन्याय के खिलाफ आवाज उठाने का, सामूहिक संर्घश के माध्यम से अपने अधिकारों को पुनः प्राप्त करने का।


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