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Monthly Archives: August 2018

निर्माण मज़दूरों के कानून का एक दुखद अध्याय


साथियों, हमारे देश की अर्थव्यवस्था मज़दूरों की लूट और शोषण पर खड़ी है। चाहे राजतन्त्र हो या लोकतन्त्र, मज़दूरों की स्थिति मे कोई सुधार नही हुआ। आज देश मे मज़दूरों और किसानों की स्थिति को देखते हुये निराशा होने लगती है। दोनांे अपनी जगह मजबूर दिखते हैं। गांव मे भी उत्पादन का मोल नहीं और शहरों मे भी असहाय श्रम। देश के छोटे बड़े सभी शहरों में सुबह सुबह नाके/लेबर चैक पर सस्ते श्रम का बाजार सजता है। यहाॅं प्रतिदिन हजारों मज़दूर काम की तलाश में आते हैं जिनमें से कुछ हीं लोगों को काम मिल पाता है। जिन श्रमिकों को काम मिलता भी है तो उन्हें पर्याप्त मज़दूरी नहीे मिलती है, काम की सुरक्षा नहीं होती और ज्यादातर मज़दूरों की मज़दूरी भी मार ली जाती है।  ये सभी निर्माण श्रमिक हैं जो देश का निर्माण और विकास करते हैं और देश की अर्थव्यवस्था मे महज्वपूर्ण योगदान भी करते हैं।

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Sheharo Ke Nirmata


Naya Shitij Ki ore


श्रमिकों के बच्चो ने मनाया स्वतंत्रता दिवस


दिल्ली निर्माण मज़दूर संगठन ने श्रमिकों के बच्चो के साथ पश्चिम विहार, जन्माष्टमी पार्क मे 72 वा स्वतंत्रता दिवस बहुत ही धूमधाम से मनाया। इस कार्यक्रम मे 150 किशोर किशोरियों ने भाग लिया। कार्यक्रम के दौरान बच्चो ने बाल विवाह, लिंग भेद, स्वच्छ भारत, शिक्षा का महत्व आदि विषय पर चित्रकला रंगोली एवं निबन्ध प्रतियोगिता का आयोजन किया। बच्चो ने बहुत ही उत्साह के साथ अलग अलग प्रतियोगिताओं मे हिस्सेदारी की। बच्चों का मनोबल बढाने के लिये बस्ती के साथियों ने एवं संगठन के साथियों ने कार्यक्रम मे अपने विचार रखे।

श्रमिकों के बच्चो ने मनाया स्वतंत्रता दिवस


दिल्ली निर्माण मज़दूर संगठन ने श्रमिकों के बच्चो के साथ जे जे कालोनी, बक्करवाला मे 72 वा स्वतंत्रता दिवस बहुत ही धूमधाम से मनाया। इस कार्यक्रम मे 70 किशोर किशोरियों ने भाग लिया। कार्यक्रम के दौरान बच्चो ने बाल विवाह, लिंग भेद, स्वच्छ भारत, शिक्षा का महत्व आदि विषय पर चित्रकला रंगोली एवं निबन्ध प्रतियोगिता का आयोजन किया। बच्चो ने बहुत ही उत्साह के साथ अलग अलग प्रतियोगिताओं मे हिस्सेदारी की। बच्चों का मनोबल बढाने के लिये बस्ती के साथियों ने एवं संगठन के साथियों ने कार्यक्रम मे अपने विचार रखे।

मेरे अस्तित्व कि क्यों कोई पहचान नही ? मैं ही माँ हूँ, बेटी हूँ, मैं बहु हूँ फिर क्यों मेरा सम्मान नही ? एक पल में मुझे पराया कर देते है मेरे अपने क्या मैं इन्सान नही ??


मेरे अस्तित्व कि क्यों कोई पहचान नही ? मैं ही माँ हूँ, बेटी हूँ, मैं बहु हूँ फिर क्यों मेरा सम्मान नही ? एक पल में मुझे पराया कर देते है मेरे अपने क्या मैं इन्सान नही ??
कुछ ऐसी ही बातों ने दिल को छु लिया जब लड़कियों के आंसुओं ने लफ्जों कि जगह ली!
आज जब लड़कियां दुनियां कि हर ऊचाई को छू लेने कि हिम्मत रखती है !वहीँ समाज कि कुछ रूढ़िवादी सोच इनकी उड़ान को रोकती है पितृसत्ता ने लिंगभेद और बालविवाह जैसी कुरीतियाँ इतनी मजबूत बनाई है जिनको तोडना आसान नही !
कार्यशाला के दौरान लड़कियों को बालविवाह ,लिंगभेद के मुद्दे पर अपनी समझ को लेकर चित्र और नारे को लेकर समूह में चर्चा हुई जिस में उन्होंने अपनी भावनाओं को उतारा और बताया के आज भी वो इन बन्धनों में बधीं है! जो इच्छाएं वो घर में नही रख पाती उन इच्छाओं को संगठन में पूरा करती है !  (more…)

आपका घर संभल गया, लेकिन कामगारों का घर कब संभलेगा


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इस साल मार्च में लोकसभा में श्रम मंत्री संतोष गंगवार ने कहा था कि सरकार घरों में काम करने वालों के लिए राष्ट्रीय नीति बनाएगी ताकि उन्हें न्यूनतम मज़दूरी मिल सके और सामाजिक सुरक्षा की व्यस्था हो सके. वैसे यह बात सुनते सुनते तीन साल से ज़्यादा का वक्त गुज़र चुका है. 2015 में ही इस नीति का एक ड्राफ्ट कैबिनेट के सामने पेश किया गया था. जिसमें ये बात थी कि इन्हें कम से कम 9000 सैलरी मिले, साल में 15 दिन की अनिवार्य छुट्टी मिले और मातृत्व अवकाश भी मिले. यह नीति कब बनेगी सरकार ही बेहतर जानती है.

 

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