DELHI SHRAMIK SANGATHAN

Home » My Story » मनहोरी की उम्र 47 साल जिला-सवाई माधोपुर, राजस्थान, की साधारण रूप से दिखने वाली महिला के संघर्ष की कहानी।

मनहोरी की उम्र 47 साल जिला-सवाई माधोपुर, राजस्थान, की साधारण रूप से दिखने वाली महिला के संघर्ष की कहानी।

मेरी कहानी


मनहोरी की उम्र 47 साल जिला-सवाई माधोपुर, राजस्थान, की साधारण रूप से दिखने वाली महिला के संघर्ष की कहानी।

बचपन का तो पता नही चला परिवार बड़ा था जिम्मेदारी ज्यादा थी घर का काम खेतो की रखवाली, गाय भैस को चराना, गेहुॅ काटई करना, भाई, बहनों की जिम्मेदारी। स्कूल की शक्ल तक देखे को नही मिली केवल बचपन मे नाम सुना था इच्छा थी परन्तु परिवारिक व सामाजिक व्यवस्था के करण स्कूल नही जा पाई।

शादी भी माता पिता ने 12 वर्ष की आयु मे कर दी, शादी का क्या मतलब है जानती ही नही थी नये कपड़े गहने मिलना अच्छा लगा। ससुराल आई तो यहॉ भी बडे परिवार की सारी जिम्मेदारी मनहोरी के कन्धो पर आ गई। शादी से जुडे सपने चूर चूर हो गये एक हाथ के घुॅघट मे घर का सारा काम करना। सुबह उठने का तो वक्त तय था 4 बजे परन्तु शाम को सोने का वक्त तय नही था सारा दिन काम और परेशानी गरीबी के करण इतने बडे परिवार को चलना मनहोरी के पति के बस से बाहर था आये दिन झगडे कलेश। काम की तलाश मे सन 1990 मे दिल्ली शहर आ गये।

शहर मे काम तो मिलगा परन्तु रहने का कोई ठिकाना नही था महरोली मे 5 रूपये किराये मे तम्बू के घर पर रहने को मिला। 15 रूपये दिहडी थी 10 रूपये घर खर्च व 5 रूपये तम्बू का किराया बड़ी ही मुश्किल से मनहोरी और उनके पति ने मेहनत करके पाई पाई इकक्ठा करके कर्जा लेकर परिचम विहार मे झुग्गी ली 1300 रूपये मे घर तो मिलगा परन्तु न तो पानी, बिजली और जंगल जैसा था शुरू शुरू मे तो बहुत डर लगता था। मनहोरी के तीन बच्चे है इतनी गरीबी और परेशानी मे भी यह ठाना की मै अपने बच्चो को जरूर पढॉउगी। आज अनपढ होने के करण मै व मेरा पति इतनी मुसीबतो को झेल रहे है। मेरे बच्चे अनपढ नही रहेगे उसने यह करके भी दिखया लडकी व लडको मे कभी भेदभाव नही किया तीनो को एक स्कूल मे पढाने के लिए भेजा तीनो को ग्रेजुवसेन करवाया।

काम की समस्या होने पर पति ने विदेश जाकर काम करने की सोची 7 साल के लिये उसका पति दुबई चला गया। शुरू मे एक दो साल पैसे भी नही भेजा मनहोरी एकदम अकेली पड़ गई घर की जिम्मेदारी बच्चों को पढना, काम पर जाना हिम्मत नही हारी एक वक्म की रोटी खाकर अपनी जिम्मेदारी उठाई पति दुबई मे बीमार पड़ गये बडी ही मुश्क्लि से उन्हे वापस बुलाया गया यह लाकर इलाज करवाया। मनहोरी संगठन से 2006 मे जुडी मनहोरी को संगठन की मीटिंग मे आना शुरू से अच्छा लगता था परन्तु काम व घर की जिम्मेदारी के करण समय निकलने मे दिक्कत होती थी परन्तु जब भी काम से आती तो परन्तु मीटिंग मे आ जाती थी। बडे लडके की नौकरी लगने पर मनहोरी को काफी सहारा मिला। घर की स्थिति पहले से थोडी बेहतर हुई पति की बीमारी के करण भारी काम नही कर पाते थे उनको भी छोटी सी दुकान घर के सामने खुलवाई इतनी परेशनीयों के बावजुद संगठन के हर कार्यक्रम मे भागीदारी लेती अपने साथ और अन्य महिलाओं को भी संगठन से जोड़ती एवं समझाती थी।

बस्ती मे किसी भी महिला के साथ घर पर व कार्य स्थल पर किसी भी तरह की हिंसा होने पर मनहोरी सदैव उसके साथ लडाने को तैयार रहती थी। मनहोरी ने संगठन मे कौशल विकास की ट्रेनिंग ली वे पहले बेलदारी का काम करती थी उसने राजमिस्त्री का काम सीखा। जब हमने उससे पूछा आप क्यो यह ट्रेनिंग लेना चाहती हो और क्या करोगी आगे अपने जीवन मे मनहोरी ने कहा मेरे जीवन मे यह पहला अवसर है कुछ सीखने का जिन्दगी के तर्जुबे ने बहुत कुछ सीखया। काम मे पहली बार सीखने का मौका मिला। अब मै बेलदारी छोड कर राजमिरूत्री का काम करूॅगी मेरी सामाजिक व आर्थिक स्थिति मे बदलाव होगा। संगठन से मैने बहुत कुछा सीखा है आत्मविश्वास आया बोलने का ताकत आई समझने की क्षमता बढी है।
जिन्दाबाद

%d bloggers like this: