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राष्ट्रीय प्रगतिशील घरेलू कामगार महासंघ


घरेलू कामगार किसे कहेंगे?

‘घरेलू कामगार’ वह व्यक्ति कहलाता है जिसे कोई परिवार अथवा व्यक्ति किसी एजेंसी केIMG_1111माध्यम से या खुद सीधे सम्पर्क कर स्थायी अथवा अस्थायी तौर पर पूरे समय या कुछ समय के लिए घरेलू या घरेलू जैसे काम के लिए रखता है और बदले में उसे एक तय मेहनताना देता है। यह मेहनताना रोकड़ या वस्तु के रूप में हो सकता है। गौरतलब है कि काम पर रखने वाले परिवार का कोई सदस्य ‘घरेलू कामगार’ की श्रेणी में नहीं रखा जा सकता है।
कन्वेंशन नंबर १८९ और अनुमोदन नंबर २०१ का मकसद घरेलू काम करने वाले कामगारों को रोजगार संबंधों के भीतर सुरक्षा मुहय्या कराना है। कन्वेंशन के अनुसार किसी एक घर या अनेक घरों में या उनके लिए किया जाने वाला काम ‘घरेलू कामकाज’ कहलाता है।
घरेलू कामकाज दुनिया के सबसे पुराने आजीविका कमाने के कामों में से एक है। घरेलू कामगार खाना पकाने, झाड़ू-पोछा करने या बच्चों, बूढ़ों अथवा शारीरिक रूप से असमर्थ लोगों की देखभाल का काम कर सकते हैं यानी ऐसे काम जो ज्यादातर समाजों में पारंपरिक रूप में महिलाओं के सुपुर्द किये जाते रहे हैं और जिनकी भरपाई ज्यादातर नहीं होती रही है। हालांकि घरेलू काम में बागबानी,वाहन चालक और सुरक्षा सेवायें मुहय्या कराने जैसे काम भी शामिल हो सकते हैं, ये ऐसे काम हैं जो ज्यादातर पुरुषों द्वारा किये जाते हैं।
घरेलू सेवा शहरी भारत में महिला रोजगार का सबसे बड़ा क्षेत्र है। भारत में पांच करोड़ से भी ज्यादा घरेलू कामगार हैं जिनमें महिलाओं की संख्या अच्छी-खासी है।
घरेलू कामगारों की खासी संख्या ऐसी होती है जो रोजगार दाता के घर पर रह कर चैबीसों घंटे काम करती है। ये प्रवासी कामगार होते हैं जो देश के अलग-अलग हिस्सों से आजीविका की तलाश में शहरों में आते हैं और कभी-कभी काम दिलवानेवाली एजेंसी के रूप में काम करने वाले दलालों के चंगुल में फंस कर शोषण का शिकार हो जाते हैं। ये दलाल एक बार फिर ठेका मजदूरी के हालात पैदा कर उसका फायदा उठा घरेलू कामगारों की आपूर्ति कर तथा उनके लिए भुगतान और ककम के अमानवीय हालात पैदा कर अपनी जेबें भरते हैं। प्रवासियों में ज्यादा संख्या आदिवासी लड़कियों की होती है। इनमें ४० फीसदी लडकियां १४ साल से काम उम्र की होती हैं। अपने परिवारों से दूर ये आदिवासी लडकियां रोजगारदाता और रोजगार दिलाने वाली एजेंसी, दोनों के ही द्वारा शोषण का शिकार बनती हैं। घर में साथ रहने वाले कामगार के अलावा ऐसे भी घेलू कामगार हैं जो पूरे दिन के लिए काम करते हैं लेकिन यह दिन ८ से १४ घंटों का हो सकता है। कुछ दूसरे घरेलू कामगार हरेक घर में कुछ घंटे ही काम करते हैं और कभी-कभी एक दिन में २ से ५ घरों में कुछ घंटे ही काम करते हैं। किसी भी कामगार को न तो सुस्ताने का अवकाश मिलता है, न ही भुगतान युक्त साप्ताहिक छुट्टी या दूसरे फायदे।
घरेलू कामगार के सामाजिक-आर्थिक हालात –
महिलाओं का बढ़-चढ़ कर काम में निकलना, काम का बढ़ता दबाव और कार्यालय एवं पारिवारिक जीवन में सामंजस्य बनाए रखने की इजाजत देने वाली मजबूत सामाIMG_1102जिक नीतियों का अभाव ज्यादातर विकसित एवं विकासशील अर्थव्यवस्थाओं में घरेलू कामगारों के वर्तमान महत्व और बढ़ती मांग को सुनिश्चित करता है।
इसके बावजूद घरेलू काम को कम करके आंका जाता है और इसका नियंत्रण भी कायदे से नहीं किया जाता। इससे यही प्रदर्शित होता है कि इस क्षेत्र में काम करने सम्बन्धी अच्छे माहौल की कितनी कमी है जो कि अनौपचारिक अर्थव्यवस्था की खासियत है। इस तरह घरेलू कामगारों ने अनेक दूसरे कामगारों, खासकर पारिवारिक महिलाओं को उत्पादक औपचारिक अर्थव्यवस्था में भागीदारी करने और आगे बढ़ने का मौका दिया है जिसके चलते ये महिलायें आर्थिक रूप से ज्यादा मजबूत हुयी हैं, हांलाकि न घरेलू कामगारों के पास खुद में वे अधिकार और सुरक्षा नहीं होते जो यह सुनिश्चित करने के लिए जरूरी हैं कि वे अच्छे काम के हालत का आनंद उठा सकें।
इन घरेलू कामगारों को निजी परिवार काम के लिए रखते हैं। इस तरह काम के इस ढाँचे के तहत काम करने का माहौल और मिलनेवाली मजदूरी हमारे देश में महिलाओं के काम और कल्याण के लिए महत्वपूर्ण परिणाम रखते हैं। घरेलू कामगारों में ज्यादातर दलित, पिछड़े और आदिवासी समुदाय से हैं और बहुत से दूसरे शहरों व गांवों से आये ऐसे लोग हैं जो जाती,वर्ग और लैंगिक ढांचे में दोयम दर्जे की भूमिका निभा रहे हैं।
ज्यादातर घरेलू कामगार गरीब, अनपढ़ हैं और शहरी श्रम बाजार को नहीं समझते हैं। उनके काम को काम करके नही आंका जाता है, उन्हें कम पैसा दिया जाता है और इसकी निगरानी करने वाला कोई होता नहीं है। हमारे देश में घरेलू कामगारों को जो प्रमुख दिक्कतें आती हैं वे हैं- अच्छी मजदूरी न मिलना , काम का बेहतर माहौल और तयशुदा काम के घंटे नहीं होना, हिंसा, गाली-गलौज, कार्यस्थल पर यौन उत्पीड़न, दलालों और प्लेसमेंट एजेंसियों द्वारा शोषण,जबरन प्रवास के लिए मजबूर, कल्याणकारी योजनाओं का अभाव और आगे बढ़ने के अवसरों के अभाव के चलते शोषण कराते रहने की मजबूरी।
कानूनी परिभाषा और श्रम कानूनों का दायरा –
घरेलू कामकाज अनौपचारिक अर्थव्यवस्था का हिस्सा है और इस कामकी प्रकृति विशिष्ट होती है। सच तो यह हैIMG_1100 कि यह कार्य किसी निजी व्यक्ति के घर पर किया जाता है जहां अक्सर साथ में काम करने वालों का अभाव होता है और ज्यादातर मामलों में रोजगार के लिखित अनुबंध और किसी भी तरह की निगरानी का अभाव होता है। चूँकि घरेलू कामकाज को श्रम बाजार मुनाफे का धंधा नहीं मानती है इसलिए इस पर मेहनत और रोजगार सम्बन्धी कानून नहीं बनाये जाते हैं। लेकिन यही काम जब होटल, रेस्टोरेंट या बूढ़ों के आश्रम में किये जाते हैं तो उन्हें कानून के नजरिये से देखा जाने लगता है।
हमारे देश के श्रम सम्बन्धी कानूनों को देखने से पता चलता है की घरेलू कामगारों को इन कानूनों में इसलिए नहीं शामिल किया जा सका क्योंकि ‘कामगार’, ‘रोजगार दाता’ और ‘काम की जगह’ को साफ-साफ समझाया नहीं गया है। इसीलिये घरेलू कामकाज दिलाने वाली एजैंसियां भी कानून के फंदे से बच जाती हैं। कहना पडेगा कि अगर घरेलू कामगारों को भीइन कानूनों में शामिल कराना है तो ‘कामगार’, ‘रोजगारदाता’ और ‘काम की जगह’ की परिभाषा को बदलना होगा। जिन कानूनों में बदलाव की जरुरत है वो हैं- न्यूनतम मजदूरी कानून १९४८, मातृत्व लाभ कानून १९६१, कामगार मुआवजा कानून १९२३, अंतर्राज्यीय प्रवासी कामगार कानून १९७९, मजदूरी भुगतान कानून १९३६, समान मजदूरी कानून १९७६, कर्मचारी राज्य बीमा कानून १९४८, कर्मचारी भविष्य निधि कानून १९५२ और ग्रेच्युटी भुगतान कानून १९७२।
घरेलू कामकाज पर बने कानून घरेलू कामगारों और उनको काम पर रखने वालों दोनों के लिए ही फायदेमंद हैं। दोनों पार्टियों से जुड़ा कानून ही काम दिलाने वाली एजेंसियों और घरेलू काम के हालात को काबू में रख सकता है और कामगारों को सामाजिक सुरक्षा दे सकता है लेकिन जैसा कि दिल्ली में किया गया घरेलू कामगारों को शॉप्स एंड इस्टैब्लिशमेंट कानून के तहत लाने से बात नहीं बनेगी और कामगारों का शोषण नहीं रुकेगा।

घरेलू कामगारों के अधिकारों की रक्षा के लिए की गयी कोशिश –
पिछले पचास-साठ सालों में घरेलू कामगारों के अधिकारों की रक्षा के लिए उन्हें कानूनों के दायरे में लाने की अनेक कोशिश की गयीं। शुरुवात १९५९ में डोमेस्टिक वर्कर्स (कंडीशन्स ऑफ इम्प्लॉयमेंट) नामक विधेयक लाकर की गयी थी। इसके बाद और भी कई कोशिश की IMG_1101गयीं लेकिन असफल रहीं। सबसे ताजा कोशिश डोमेस्टिक वर्कर्स (कंडीशन्स ऑफ सर्विस) विधेयक २००९ है जिसे सांसद अर्जुन राम मेघवाल ने निजी विधेयक के रूप में सदन में पेश किया था। २००८ में राष्ट्रीय महिला आयोग ने एक विधेयक तैयार किया था। इसी तरह २०१० में घरेलू कामगार अधिकार अभियान ने भी एक विधेयक तैयार किया था लेकिन अभी तक संसद द्वारा पारित कोई कानून नहीं बना है। यह एक बहुत बड़ी कमी है, खासकर तब जब अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन का कन्वेंशन १८९ इस बात की ताकीद करता है। भारतीय संविधान की धाराएं ४१ और ४३ ए हमारी मांगों का आधार हैं।
हाल के सालों में घरेलू कामगारों को कानूनी व सामाजिक सुरक्षा देने के लिए हमारी सरकार ने कुछ कदम उठाये हैं। असंगठित क्षेत्र के कामगारों की सामाजिक सुरक्षा कानून २००८ और सेक्सुअल हरासमेंट ऑफ विमेन एट वर्कप्लेस (प्रिवेंशन,प्रोहिबिशन एंड रिड्रेसल) कानून २०१३ में घरेलू कामगारों को शामिल किया गया है। कुछ और भी उपाय किये गए हैं जैसे कि राष्ट्रीय स्वस्थ बीमा योजना में घरेलू कामगारों को शामिल करना और कुछ राज्य सरकारों द्वारा न्यूनतम मजदूरी की अधिसूचना जारी करना।
१६ जून २०११ को अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन ने कन्वेंशन नंबर १८९ को अपनाया। इसे घरेलू कामगार कन्वेंशन १८९ के नाम से भी जाना जाता है। यह घरेलू कामगारों के मूलभूत अधिकारों की पुष्टि करता है।
संक्षेप में घरेलू कामगारों की सुरक्षा और कल्याण के लिए नीचे दी गयी कोशिश की गयी हैं-
(अ ) घरेलू कामगार (पंजीकरण, सामाजिक सुरक्षा और कल्याण) कानून २००८ (राष्ट्रीय महिला आयोग द्वारा तैयार विधेयक का मसौदा)
(ब ) घरेलू कामगार कल्याण और सामाजिक सुरक्षा कानून २०१० (घरेलू कामगार अधिकार अभियान द्वारा तैयार विधेयक का मसौदा)
(स ) घरेलू कामगारों के लिए राष्ट्रीय नीति का मसौदा
(द ) अंतर्राष्ट्रीय श्रम संIMG_1084गठन कन्वेंशन १८९ य घरेलू कामगारों का अच्छा काम करने का अधिकार
(य ) कुछ राज्यों द्वारा घरेलू कामगारों के लिए न्यूनतम मजदूरी
(र ) घरेलू कामगारों को राष्ट्रीय स्वास्थय बीमा योजना में शामिल करना

घरेलू कामगारों के एक महासंघ की जरुरत –
देश के सामजिक एवं महिला संगठनों ने घरेलू कामगारों के कल्याण के लिए कई कोशिश की हैं लेकिन अब तक कोई ठोस कानून हाथ नहीं आया है। टी यूं सी सी के अलावा किसी और राष्ट्रीय कर्मचारी संगठन ने इस ओर ध्यान नहीं दिया है। यही कारण है कि भारत सरकार घरेलू कामगारों के अधिकारों की सुरक्षा सम्बन्धी कानून लाने में ढिलाई बरत रही है।
निसंदेह अब घरेलू कामगारों को संगठित करने और उनके संगठनों का राष्ट्रीय स्तर पर महासंघ बनाने का समय आ गया है। इसीलिये टीयूंसीसी से जुड़े सदस्य सँगठनों ने घरेलू कामगारों के संगठनों का एक महासंघ बनाने का फैसला किया है। यह महासंघ राष्ट्रीय प्रगतिशील घरेलू कामगार महासंघ कहलायेगा।
महासंघ, इसके घटक और मांगें –
राष्ट्रीय प्रगतिशील घरेलू कामगार महासंघ देश के आठ राज्यों में काम कर रहे घरेलू कामगार संगठनों का महासंघ है। यह टीयूंसीसी से जुड़ा है और टीयूंसीसी भारत सरकार के श्रम एवं रोजगार मंत्रालय द्वारा मान्यता प्राप्त राष्ट्रीय कर्मचारी संघ है। ये आठ राज्य हैं- आंध्र प्रदेश, बिहार, दिल्ली, झारखंड, महाराष्ट्र, पंजाब, उत्तर प्रदेश और पश्चिम बंगाल।IMG_1061
राष्ट्रीय प्रगतिशील घरेलू कामगार महासंघ दूसरे क्षेत्रीय कानूनों की ही तरह घरेलू क्षेत्र के कामगारों के लिए भी एक खास कानून की मांग करता है कुछ उसी तरह के जैसे नीचे दिए कानून बने हैं-
डॉक वर्कर्स (रेगुलेशन ऑफ इम्प्लॉयमेंट) कानून १९४८, बीड़ी एन्ड सिगार वर्कर्स (कंडीशंस ऑफ इम्प्लॉयमेंट) कानून १९६६, दी महाराष्ट्र मथाड़ी, हमाल एण्ड अदर मैन्युअल वर्कर्स (रेगुलेशन ऑफ एम्प्लॉयमेंट एण्ड वेल्फेयर) कानून १९६९ और दी बिल्डिंग एण्ड अदर कंस्ट्रक्शन वर्कर्स कानून, १९९६।
यह बात बिलकुल साफ है कि केवल केंद्रीय कानून ही इस क्षेत्र को नियंत्रित करने के जरुरत को पूरा कर सकता है क्योंकि कामगार अक्सर दूसरे राज्यों की सीमाओं को लांघते रहते हैं।
घरेलू कामगारों के लिए हम जिस सम्पूर्ण कानून की मांग कर रहें हैं उसमें नीचे दी गयी बातें शामिल होनी चाहिए और इन बातों से किसी भी तरह कासमझौता नहीं किया जा सकता है –

अ. कानून रोजगार और काम की शर्तों के बारे में बात करता हो और साथ ही सामजिक सुरक्षा मुहैय्या करता हो –

जैसे रोजगार और काम की दू IMG_1062IMG_1060 सरी शर्तों को तय करना, रोजगार की सुरक्षा और विवादों का निपटारा, साथ ही सामाजिक सुरक्षा, बच्चों की देख-भाल की सुविधा, रहने के मकान, प्रशिक्षण और कौशल विकास की सुविधा मुहैय्या कराना।
ब. कानून को लागू करने के लिए त्रिपक्षीय बोर्ड का गठन –
इस बोर्ड में कामगारों की भागीदारी कर्मचारी संघों और राष्ट्रीय महासंघ से आये अपने प्रतिनिधियों के माध्यम से होगी। महिलाओं को अपनी संख्या के अनुपात में भागीदारी मिलेगी। असरदार ढंग से काम करने के लिए जरूरी है कि बोर्ड स्वायत्त रहे यानी कि अपने फैसले खुद ले सके। बोर्ड के भीतर ही विवाद और शिकायतें सुलझा लेने का तरीका होना चाहिए।
बोर्ड नीचे दिए काम करेगा –
– कामगारों का पंजीकरण और सामाजिक सुरक्षा की दिशा में उनका आर्थिक सहयोग।
– काम की शर्तों को लेकर नियम बनाना।IMG_0975
– सामाजिक सुरक्षा।
– रोजगारदाता का पंजीकरण और सामाजिक सुरक्षा की दिशा में उनका आर्थिक सहयोग।
– यह देखना कि न्यूनतम मजदूरी मिल रही है कि नहीं।
– घरेलू महिला कामगारों के यौन शोषण अथवा उत्पीड़न सम्बन्धी शिकायतों की सुनवाई के लिए सभी स्तरों पर शिकायत समिति और बोर्ड की एक हेल्प लाईन का गठन होना चाहिए।
स. प्लेसमेंट एजेंसी के पंजीकरण की जिम्मेदारी बोर्ड की है –
इसके तहत एजेंसियों को अपने यहाँ दर्ज सभी घरेलू कामगारों का ब्यौरा बोर्ड को देना होगा जैसे कि उनके नाम, पते और फोटो और उसी के हिसाब से फीस भी देनी होगी।
द. घरेलू कामगारों को कहना होगा कि काम पर जाते समय वे अपने समूह को अधिक बढ़ायें।
य. बोर्ड को घरेलू कामगारों के कौशल को अधिक बढ़ाने का प्रशिक्षण देना चाहिए।
र. कामगारों को ऐसा साथ में रखने वाला स्मार्ट कार्ड दिया जाना चाहिए जो देश भर में चले ताकि रिटायर होने के बाद वे जहां कहीं भी रहें उसका फायदा उन्हें मिलता रहे।
ल. जबकि केंद्र सरकार का कानून एक आदर्श खाका और नियम बनायेIMG_0972 वहीं राज्य सरकारों को भी यह कहा जाए कि वे भी घरेलू कामगारों के लिए ज्यादा से ज्यादा योजनाएं बनाएं।
जैसा कि श्रम सम्बन्धी स्टैंडिंग कमेटी ने सुझाव दिया है कि देश के कुल उत्पादन की कीमत का ३ फीसदी हिस्सा असंगठित कामगारों की सामजिक सुरक्षा के लिए अलग रख दिया जाना चाहिए, इसमें से एक औसत राशि घरेलू कामगारों की सामाजिक सुरक्षा के लिए होनी चाहिए। स्थानीय निकायों द्वारा उगाहे गए IMG_0987गृह कर की राशि में से एक फीसदी राशि इन कामगारों के लिए बने कल्याणकारी बोर्ड के फंड में जोड़ दी जानी चाहिए।

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