श्रमिकों के बच्चो ने मनाया स्वतंत्रता दिवस


दिल्ली निर्माण मज़दूर संगठन ने श्रमिकों के बच्चो के साथ पश्चिम विहार, जन्माष्टमी पार्क मे 72 वा स्वतंत्रता दिवस बहुत ही धूमधाम से मनाया। इस कार्यक्रम मे 150 किशोर किशोरियों ने भाग लिया। कार्यक्रम के दौरान बच्चो ने बाल विवाह, लिंग भेद, स्वच्छ भारत, शिक्षा का महत्व आदि विषय पर चित्रकला रंगोली एवं निबन्ध प्रतियोगिता का आयोजन किया। बच्चो ने बहुत ही उत्साह के साथ अलग अलग प्रतियोगिताओं मे हिस्सेदारी की। बच्चों का मनोबल बढाने के लिये बस्ती के साथियों ने एवं संगठन के साथियों ने कार्यक्रम मे अपने विचार रखे।

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श्रमिकों के बच्चो ने मनाया स्वतंत्रता दिवस


दिल्ली निर्माण मज़दूर संगठन ने श्रमिकों के बच्चो के साथ जे जे कालोनी, बक्करवाला मे 72 वा स्वतंत्रता दिवस बहुत ही धूमधाम से मनाया। इस कार्यक्रम मे 70 किशोर किशोरियों ने भाग लिया। कार्यक्रम के दौरान बच्चो ने बाल विवाह, लिंग भेद, स्वच्छ भारत, शिक्षा का महत्व आदि विषय पर चित्रकला रंगोली एवं निबन्ध प्रतियोगिता का आयोजन किया। बच्चो ने बहुत ही उत्साह के साथ अलग अलग प्रतियोगिताओं मे हिस्सेदारी की। बच्चों का मनोबल बढाने के लिये बस्ती के साथियों ने एवं संगठन के साथियों ने कार्यक्रम मे अपने विचार रखे।

मेरे अस्तित्व कि क्यों कोई पहचान नही ? मैं ही माँ हूँ, बेटी हूँ, मैं बहु हूँ फिर क्यों मेरा सम्मान नही ? एक पल में मुझे पराया कर देते है मेरे अपने क्या मैं इन्सान नही ??


मेरे अस्तित्व कि क्यों कोई पहचान नही ? मैं ही माँ हूँ, बेटी हूँ, मैं बहु हूँ फिर क्यों मेरा सम्मान नही ? एक पल में मुझे पराया कर देते है मेरे अपने क्या मैं इन्सान नही ??
कुछ ऐसी ही बातों ने दिल को छु लिया जब लड़कियों के आंसुओं ने लफ्जों कि जगह ली!
आज जब लड़कियां दुनियां कि हर ऊचाई को छू लेने कि हिम्मत रखती है !वहीँ समाज कि कुछ रूढ़िवादी सोच इनकी उड़ान को रोकती है पितृसत्ता ने लिंगभेद और बालविवाह जैसी कुरीतियाँ इतनी मजबूत बनाई है जिनको तोडना आसान नही !
कार्यशाला के दौरान लड़कियों को बालविवाह ,लिंगभेद के मुद्दे पर अपनी समझ को लेकर चित्र और नारे को लेकर समूह में चर्चा हुई जिस में उन्होंने अपनी भावनाओं को उतारा और बताया के आज भी वो इन बन्धनों में बधीं है! जो इच्छाएं वो घर में नही रख पाती उन इच्छाओं को संगठन में पूरा करती है !  (more…)

आपका घर संभल गया, लेकिन कामगारों का घर कब संभलेगा


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इस साल मार्च में लोकसभा में श्रम मंत्री संतोष गंगवार ने कहा था कि सरकार घरों में काम करने वालों के लिए राष्ट्रीय नीति बनाएगी ताकि उन्हें न्यूनतम मज़दूरी मिल सके और सामाजिक सुरक्षा की व्यस्था हो सके. वैसे यह बात सुनते सुनते तीन साल से ज़्यादा का वक्त गुज़र चुका है. 2015 में ही इस नीति का एक ड्राफ्ट कैबिनेट के सामने पेश किया गया था. जिसमें ये बात थी कि इन्हें कम से कम 9000 सैलरी मिले, साल में 15 दिन की अनिवार्य छुट्टी मिले और मातृत्व अवकाश भी मिले. यह नीति कब बनेगी सरकार ही बेहतर जानती है.

 

Massive Rally & Protest by Domestic Workers


 

Demanding Comprehensive Legislation for Domestic Workers and Withdrawal of the draft social security codes

On August 2nd at Parliament street

Ever since the GOI voted for ILO Convention 189, the domestic Workers in India have been demanding a Legislation to protect their rights. The statistics on domestic workers vary from 4.75 million (NSS 2005 data) to 6.4 million (Census data). Some reports say that the number of domestic workers may be up to 90 million in India. Domestic work has been increasing over the years (222% since 1999-2000). While paid domestic work was once a male dominated occupation in pre-independence India (Neetha 2004), today women constitute 71 percent of this sector. National estimates for 2004-5 suggest 4.75 million workers were employed by private households, making domestic work as the largest female occupation in Urban India. The data may be underreported because of several reasons, the main being that domestic work is not treated as ‘real’ work leading to large instances of undeclared work. Secondly, being within the home, domestic workers are largely invisible and thirdly, this can be a part time occupation, with workers taking up other seasonal occupations. The demand for domestic workers is also on the increase.

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